चम्बा रियासत


चम्बा रियासत के चम्बा जम्मू और कश्मीर से उतर-पश्चिम, जम्मू-कश्मीर राज्य के लद्दाख क्षेत्र और हिमाचल प्रदेश के लाहौल और बडा-बंगाल क्षेत्र, दक्षिण-पूर्व और दक्षिण में जिला कांगडा द्वारा उतर-पूर्व और पूर्व में चम्बा की सीमा पर पंजाब के हिमाचल प्रदेश और गुरदासपुर जिला स्थित है।चम्बा जिला उतर अक्षांश 32̊ 11’ 30“ और 33̊ 13’ 6“ और पूर्वी देशांतर 75̊ 49’ और 77̊ 3’ 30“ के बीच स्थित है अनुमानित क्षेत्र के 6522 वर्ग कि0 मी0 के साथ और विशाल पहाडी पर्वतमाला द्वारा सभी तरफ से घिरा हुआ है। यह क्षेत्र पूर्ण रुप से 2000 से 21000 फीट तक की ऊंचाई वाली पहाडी हैं।
चम्बा भगवान शिव की भूमि अपने अनछुए प्राकृतिक सौदंर्य के लिए प्रसिद्ध हैं। मख्य पर्यटन स्थलों के रुप में जिले में डलहौजी, खज्जीयार, चम्बा शहर, पांगी और भरमौर है। यहां पांच झीलें है, पांच वन्य जीव अभ्यारण और अनगिनत मन्दिर हैं।
चम्बा, हिमाचल प्रदेश का एक छोटा लेकिन आकर्षक पर्यटन स्थल है, इसकी उतम प्राकृतिक सुन्दरता के लिये जाना जाता है। यह जगह, सुरम्य और सफेद घाटियों के बीच स्थित है, पर्यटकों द्वारा वर्ष भर मे दौरा किया जाता हैं। पहाडो की उप-हिमालय श्रृंखला, विविध, वनस्पतियों और जीवों से भरा है। चम्बा को एक प्राणपोषक अनुभव बनाते है। जगह का सुखद माहौल एक और पहलू है कि चम्बा पूरे भारत में लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक हैं। जिले रूप में इसका गठन 15 अप्रैल 1948 को हुआ था।

चम्बा रियासत के महत्वपूर्ण पहलू


चम्बा रियासत की स्थापना 550 ई में अयोध्या से आये सूर्यवंशी राजा मारू ने की थी।


आदित्या वर्मन ने सर्वप्रथम वर्मन की उपाधि धारण की थी।


मेरु वर्मन ने भरमौर में मणिमहेश, लक्षणा देवी मंदिर, गणेश मंदिर, नर्सिंग मंदिर और चतरारी में शकतीदेवी मंदिर निर्माण करवाया।


गुगा शिल्पी मेरुवर्मन का प्रसिद्ध शिल्पी था।


लक्ष्मी वर्मन के कार्यकाल में तिब्तियो (किरातो) ने चम्बा में कब्ज़ा किया।

सहिलवर्मन ने चम्बा शहर की स्थापना की। उसने अपनी पुत्री चंपावती के नाम पर चम्बा नाम रखा।


साहिल वर्मन को चरपट सिद्ध योगी ने दस पुत्र और एक पुत्री का आशीर्वाद दिया था।


सहिलवर्मन की पत्नी रानी नैना देवी ने शहर में पानी की व्यवस्था लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया ।
रानी नैना देवी की याद में हर वर्ष सुही मेला मनाया जाता है।साहिल वर्मन ने लक्ष्मी नारायण, कमेशावर मंदिर का निर्माण करवाया।


युगांकर वर्मन की पत्नी त्रिभुवन रेखा ने भरमौर में नरसिंह मंदिर का निर्माण करवाया।


जसाटा वर्मन क समय का शिलालेख चुराह के लोहटिक्री में मिला है।


ललित वर्मन के कार्यकाल में दो पत्थर लेख डिबी कोठी और सेचुनला (पांगी) में प्राप्त हुए।


गणेश वर्मन ने राज परिवार में सर्वप्रथम सिंह की उपाधि का प्रयोग किया।


उमेद सिंह ने राजनगर में नाडा महल बनवाया ।


राजा भुरिसिंह को 1 जनवरी 1906 ई को नाइट हुड की उपाधि प्रदान की गई।


भुरी सिंह संग्रहालय को स्थापना 1908 ई में की।


राजा लक्ष्मन सिंह चम्बा का अंतिम राजा था।


चकली चंबा रियासत का प्रसिद्ध सिक्का था।


लकड़ शाह ब्रह्मण श्री सिंह के समय में प्रसिद्ध हुआ।


जतिगीरी पर्यटक स्थल चंबा में स्थित है।


गुड़ मास की बुनाई चंबा में होती है।


1839 ई में यूरोपीय यात्री विंग्ने पहली बार चंबा आया था।


चंबा में बशोली चित्रकला शैली विकसित हुई।


अजित सिंह मेमोरियल चंबा के पंजपुला (डलहौजी) में स्थित है।


तुनुहटी चंबा में स्थित है।


मेले, मंदिर ,कला, एंव संस्कृति

मिंजर मेला- मिंजर मेला साहिल वर्मन द्वारा शुरू किया गया था। इसमें चंबा के लक्ष्मीनारायण मंदिर में पूजा की जाती है।
मिंजर का अर्थ – मक्की का सीटा जिसे रावी नदी में बहाया जाता है।

दूसरा इस मेले को राजा प्रताप द्वारा कांगड़ा शाशक पर विजय का प्रतीक भी माना जाता है।


सुही मेला- यह मेला साहिल वर्मन ने शुरू किया था। साहिल वर्मन की पत्नी नयना देवी की राज्य में पानी की आपूर्ति के बलिदान देने पर यह मेला प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

यात्रा- फूल यात्रा

मणिमहेश यात्रा

नवाला मेला चंबा में गद्दी जनजाति द्वारा मनाया जाता है
कला– चंबा की रुमाल कला ।

चंबा शेली की चित्रकला का उदय राजा उदय सिंह समय में हुआ गुलेर से आए निक्कू, छजू , हरकु इस शैली के मुख्य कलाकर थे।
लोकनृत्य– झांजर, नाटी

गीत – कुंजू चंचलो, रंजू- फुलमू, भूकू-गदी

भाषा – चंबयाली , भट्यती , चुराह, पंगवाली, भरमौरी



जल विद्युत परियोजना- चमेरा-1 (540mw)

चमेरा-2 (300mw)

बेरास्युल- 198mw

हडसर-60mw

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