ऊना

ऊना भारतीय राज्य हिमाचल प्रदेश का एक जिला है। ऊना जिला में पाँच तहसीले हैं-हरोलीघनारी , उनाअम्बबंगाणाहैं।
जिले के रूप में गठन 1972 ई हुआ है।

क्षेत्रफल1,549 किमी²

जनसंख्या(2011)- 5,21,057

घनत्व–  340/किमी²
{इतिहास}
[ ऊना जिला मुख्यत: जसवां रियासत और कुटलेहर रियासत के अन्तर्गत आता था]

जस्वां रियासत: ऊना जिले का अधिकतर भाग जसवां रियासत के अन्तर्गत आता था।
• जसवां रियासत की स्थापना कांगड़ा के कटोच वंश के राजा पूर्व चंद ने 1170 ई में की थी।
• जसवां रियासत कांगड़ा से टूटकर बनने वाली पहली रियासत थी।
• इस रियासत पर पूर्व चंद से लेकर उमेद सिंह तक 27 राजाओं ने शासन किया।
• संसार चंद के विरूद्ध उमेद चंद ने गौरखो का साथ दिया था।


[कुटलेहर रियासत भी ऊना जिले का हिस्सा थी जो कांगड़ा रियासत से टूटकर बनी थी]

• कुटलेहर रियासत कांगड़ा की सबसे छोटी रियासत थी।

• इस रियासत की स्थापना जसपाल नामक ब्राह्मण ने की।

• संसार चंद ने 1786 ई में कुटलेहैर पर कब्ज़ा किया जिसे बाद में गोरखाओं ने आजाद करवाया।

• वर्ष 1809 ई में राज्य सिक्खों के अधीन आ गया।

• बेदी विक्रम सिंह ने 1848 ई में अंग्रेज़ो के विरूद्ध विद्रोह किया।
• ऊना जिले से सर्वप्रथम 1905 ई में बाबा लछमन दास आर्य ने स्वाधीनता आंदोलन में प्रवेश किया।
• ऊना शहर कि नींव बाबा कलाधारी ने रखी थी।

{ वर्तमान ऊना जिला 1966 ई से पूर्व पंजाब के होशियार पुर जिले कि तहसील थी। वर्ष 1966 ई से 1972 ई तक अना कांगड़ा जिले का भाग था। वर्ष 1972 ई में ऊना को जिले का दर्जा प्रदान किया गया}


{मंदिर – मेले}
[मां चिंतपूर्णी धाम]
चिंतपूर्णी माता के मंदिर में हर वर्ष नवरात्रों में मेले का आयोजन होता है जिसमें देश के अलग – अलग राज्यो से आकर लोग मां का आशीर्वाद प्राप्त करते है।

चिंतपूर्णी धाम हिमाचल प्रदेश मे स्थित है। यह स्थान हिंदुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलो में से एक है। यह 51 शक्ति पीठो मे से एक है। यहां पर माता सती के चरण गिर थे। इस स्थान पर प्रकृति का सुंदर नजारा देखने को मिल जाता है। यात्रा मार्ग में काफी सारे मनमोहक दृश्य यात्रियो का मन मोह लेते हैं और उनपर एक अमिट छाप छोड़ देते हैं। यहां पर आकर माता के भक्तों को आध्यात्मिक आंनद की प्राप्ति होती है।
[गुरुद्वारा बाबा बड़भाग सिंह ]
• यह स्थान ऊना के मेड़ी में स्थित है। यहां हर वर्ष मेले का आयोजन होता है जिसमें देश के अलग अलग राज्यो लोग भाग लेते है।

300 वर्ष पूर्व बाबा राम सिंह के सुपुत्र संत बाबा वड़भाग सिंह करतारपुर पंजाब से आकर यहां बसे थे। कहा जाता है कि अहमद शाह अब्दाली के तेहरवें हमले से क्षुब्ध् होकर बाबा जी को मजबूरन करतारपुर छोड़कर पहाड़ों की ओर आना पड़ा था। जब बाबा जी दर्शनी खड्ड के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि अब्दाली की अफगान फौजें उनका पीछा करते हुए उनके काफी नजदीक आ गई हैं। इस पर बाबा जी ने आध्यात्मिक शक्ति से खड्ड में जबरदस्त बाढ़ ला दी और अफगान फौज के अध्कितर सिपाही इसमें बह गए और कुछ जो बचे वे हार मानकर वापिस लौट गए। उसके बाद बाबा जी एक स्थान पर तपस्या में लीन हो गए।
[पवित्र स्नान बाबा बड़भाग सिंह]

• प्रसिद्ध धार्मिक स्थल डेरा बाबा बड़भाग सिंह मैड़ी  ऐतिहासिक होला मेला परंपरागत उल्लास के साथ मनाया जाता है।

• 3 मार्च से 12 मार्च तक लोग यहां पहुंच कर शीश नवाते है,मुरादें पूरी होती है ।

• चरण गंगा में हजारों लोग स्नान करते है।


{परीक्षाओं से संबधित ऊना जिले के कुछ महत्वूर्ण पहलू}

ऊना तहसील को जिले का दर्जा यशवंत सिंह परमार जी ने दिया था।

✓ होशियार पुर की ऊना तहसील को हिमाचल में 1966 ई में मिलाया गया।

✓ ऊना जिले का सबसे बड़ा गांव देहला है।

✓ जसवान दुन्न ऊना जिले का पुराना नाम है।

✓ ठाकुर हजार सिंह ऊना जिले से संबधित है।

✓ ऊना नंगल रेलवे लाइन 1991 ई में बनाई गई। यह ब्रॉड गेज रेलवे लाइन है।

कुल्लू

कुल्लू भारत के हिमाचल प्रदेश प्रान्त का एक शहर है। कुल्‍लू घाटी को पहले कुलंथपीठ कहा जाता था। कुलंथपीठ का शाब्दिक अर्थ है रहने योग्‍य दुनिया का अंत। कुल्‍लू घाटी भारत में देवताओं की घाटी रही है। हिमाचल प्रदेश में बसा एक खूबसूरत पर्यटक स्‍थल है कुल्‍लु। बरसों से इसकी खूबसूरती और हरियाली पर्यटकों को अपनी ओर खींचती आई है। ब्यास नदी के किनारे बसा यह स्‍थान अपने यहां मनाए जाने वाले रंगबिरंगे दशहरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां 17वीं शताब्‍दी में निर्मित रघुनाथजी का मंदिर भी है जो हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ स्‍थान है। सिल्‍वर वैली के नाम से मशहूर यह जगह केवल सांस्‍कृतिक और धार्मिक गतिविधियों के लिए ही नहीं बल्कि एडवेंचर स्‍पोर्ट के लिए भी प्रसिद्ध है।
जिले के रूप में गठन – 1963

क्षेत्रफल – 5503 वर्ग किलमीटर

जनसंख्या – 4,37,474 (2011 में)

{इतिहास}
कुल्लू का पौराणिक ग्रंथों में कुलूत्त देश के नाम से वर्णन मिलता है। रामायण , विष्णुपुरान , महाभारत , राज तरगिनी में कुलूत का वर्णन मिलता है।
• कुल्लू रियासत की स्थापना विहंग मणिपाल ने कि थी जो हरिद्वार से आए थे।
• विहंग मणिपाल ने रियासत की पहली राजधानी ( नास्त) जगतसुख स्थापित की।
• विसुधपाल ने करमचंद को हराकर कुल्लू की राजधानी जगतसुख से नगर बनाई ।
• राजा रूद्रपाल के समय स्पीति राजा राजेन्द्र सेन ने कुल्लू पर आक्रमण करके उसे नजराना देने के लिए विवश किया।
• पाल वंश के 72 वा राजा उदर्नपाल ने जगतसुख में संध्या देवी का मंदिर बनवाया।

{ पाल वंश का अंतिम शासक कैलाश पाल जो कि कुल्लू का अंतिम राजा था जिसके साथ पाल उपाधि का प्रयोग हुआ।}


[ सिंह बन्दानी वंश]

केलाशपाल के बाद 50 वर्षों के अधिकतर समय में कुल्लू सुकेत रियासत के अधीन रहा। वर्ष 1500 ई में सिद्ध सिंह ने सिंह बदानी वंश स्थापना की। जगतसुख को अपनी राजधानी बनाया।

{बहादुर सिंह 1532 ई}
बहादुर सिंह 1532 ई सुकेत के राजा अर्जुन सेन का समकालीन था।

• इनके राज्य की राजधानी उस समय नगर थी।

बहादुर सिंह ने अपने पुत्र प्रताप सिंह का विवाह चंबा के राजा गणेश वर्मन की बेटी से करवाया।

{ जगत सिंह 1637-72 ई}
• जगत सिंह कुल्लू रियासत का सबसे शक्तिशाली राजा था।

• जगत सिंह ने लग बजीरी और बाहरी सिराज पर कब्ज़ा किया।

• जगत सिंह 1640 ई में दाराशिकोह के विरूद्ध विद्रोह किया।

• राजा जगत सिंह ने ट्टिपरी के ब्राह्मण की आत्महत्या दोष से मुक्त होने के लिए जगत सिंह ने दामोदर दास से रघुनाथ जी की प्रतिमा अयोध्या से मंगवाकर स्थपित कर राज पाठ उन्हें सौंप दिया।

{मानसिंह 1688-1702 ई}
• कुल्लू के राजा मानसिंह ने मंडी पर आक्रमण कर गुम्मा तथा द्रंग नमक की खानों पर 1700 ई में कब्ज़ा कर लिया।

• उन्होंने भंगाल क्षेत्र में कबजा किया।

• लाहौल – स्पीति को अपने अधीन कर तिबत की सीमा लिगंटी नदी के साथ निर्धारित की।

• उनके शासनकाल में कुल्लू रियासत का क्षेत्रफल 10,000 वर्ग मील हो गया ।

[कुल्लू रियासत से सम्बन्धित कुछ और महत्पूर्ण पहलू]
✓ राजा राजसिंह समय गुरु गोबिंद सिंह ने कुल्लू यात्रा की थी।

✓ कुल्लू पर पहला सिक्ख आक्रमण कारी दीवान मोहकम चन्द था।

✓ राजा अजीत सिंह के समय 1820 ई में विलियम मूरक्राफ्ट ने कुल्लू की यात्रा की थी।

✓ राजा अजीत सिंह को सिक्ख सम्राट शेर सिंह ने कुल्लू से खदेड़ दिया।

✓ कुल्लू रियासत 1840 ई से 1846 ई तक सिखों के अधीन रही।

✓ प्रथम सिक्ख युद्ध 9 मार्च , 1846 ई को कुल्लू रियासत अंग्रेज़ो के अधीन आ गई।

{मेले और मंदिर}
[कुल्लू दशहरा]

कुल्लू के ढालपुर मैदान में दशहरा के दिन रघुनाथ जी की यात्रा निकाली जाती है।

✓ कुल्लू दशहरा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का त्योहार जो कि सात दिनों तक चलता है।
✓ भगवान परशुराम की याद में भडोली मेला मनाया जाता है।

✓ निरमंड कुल्लू में बूढ़ी दीवाली मनाई जाती है।

✓ देवी हिडिंबा कि याद में डूंगरी मेला मनाया जाता है।

{मंदिर}
[हिडिंबा देवी मंदिर]

✓ यह मंदिर कुल्लू मनाली में स्थित है जिसे कुल्लू के राजा बहादुर सिंह ने 1553 ई में बनवाया था।

✓ कुल्लू राजवंश की कुल देवी भगवती हिडिंबा माना जाता है।
✓ निरमंड में परशुराम मंदिर स्थित है।

✓ निरमंड को कुल्लू का छोटा काशी कहते है।
[विश -वेष्वर महादेव मंदिर]

यह मंदिर कुल्लू के ब्जोरा में स्थित है।


{कृषि और पशपालन}
✓ कुल्लू के सैंज के खद्यान बीज संवर्धन फार्म है।

✓ सब्जी अनुसंधान केन्द्र कट-रैन में स्थित है।

✓ मनाली में ए.टी. बैनान ने 1864 ई में ब्रिटिश किस्म के सेब लगाए।
{कुल्लू के मोहल में 1964 ई में अंगोरा खरगोश फार्म स्थापित किया गया था}
{जल विद्युत परियोजनाएं}

पार्वती जल विद्युत परियोजना- इस परियोजना में तीन विद्युत गृह है । ( नकथाप , सैंज , लारजी)

• पार्वती परियोजना- 2051mw
• मलाणा परियोजना- 86mw
• लारजी परियोजना- 126mw

{परीक्षाओं से सम्बन्धित कुल्लू राज्य से कुछ महत्वपूर्ण बिंदु}

• मनाली कुल्लू का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। मनाली का नाम मनाली ऋषी मनु के नाम पर पड़ा।

पर्वतारोहण संस्थान मनाली में है जिसकी स्थापना 1961 ई मे की है।

अर्जुन गुफा कुल्लू के भनारा गांव में स्थित है।

• मणिकर्ण जहा गर्म पानी का चश्मा है।

• कुल्लू नगर में रोरीक कला संग्रहालय है।

• मलाना गांव कुल्लू में स्थित है जहा विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र हैं। जामलु देवता यहां साशन करते है।

• तिर्थन में ग्रेट हिमालयन राष्ट्रीय पार्क है।

• कुल्लुत्त देश कहानी पुस्तक लाल चंद प्रार्थी ने लिखी। इन्होंने 1942 ई के भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया था।

किन्नौर

पौराणिक किन्नौरों की भूमि किन्नौर हिमाचल प्रदेश के उत्तर पूर्व में स्थित एक जिला है। किन्नौर जिले का मुख्याल्य रिकांग पिओ है। ऊंचे-ऊंचे पहाडों और हरे-भरे पेडों से घिरा यह क्षेत्र ऊपरी, मध्य और निचले किन्नौर के भागों में बंटा हुआ है।

प्राकृतिक द्श्यावली से भरपूर इस ज़िले की सीमा तिब्बत से सटी हुई है, जो इसे सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है।

पहाडों और जंगलों के बीच कलकल ध्वनि से बहती सतलुज और स्पीति नदियों का संगीत यहां की सुंदरता में चार चांद लगा देता है। स्पीति नदी आगे चलकर खाब में सतलुज से मिल जाती है। जिले के रूप में इसका गठन 21 अप्रैल , 1960

मुख्यालय-रिकांग पिओ
क्षेत्रफल-6,401 कि॰मी2 (2,471 वर्ग मील)
जनसंख्या-84298

तहसीलें
सांगला, पूह, निचर, मूरांग कल्पा

{इतिहास}

किन्नौर राज्य रामपुर बुशहर रियासत का एक अंग था। यहां पर बहुपति प्रथा पाई जाती है। यहां के प्रसिद्ध राजा थे—प्रतमपाल, चतरसिंह तथा केहरी सिंह, जिसे ‘अजान बाहु’ नाम से भी जाना जाता था।

  • किन्नौर की आदिम जाति की उत्पत्ति देविक लीला से हुई मानी जाति है।

• अमरकोश ग्रंथ में किन्नर जाति का वर्णन मिलता है।

• तीबती लोग किन्नौर को खुन्नू कहते है।

• पांडवो ने 12 वर्ष का वनवास किन्नोर में बिताया था।

• वायु पुराण में किन्नरों को महानंद पर्वत का निवासी बताया गया है।


{मध्यकालीन इतिहास}
बुशहर रियासत बिलासपुर और सिरमौर के साथ शिमला पहाड़ी राज्यो कि तीन प्रमुख शक्तियों में से एक थी।

• राजा चतर सिंह बुशहर का 110 वां शासक था। जिनका पुत्र केहरी सिंह रियासत का सबसे शक्तिशाली राजा था । जिसे आजानुबाहु भी कहा गया है।

• मुगल बादशाह ओरांगजेब ने केहरी सिंह को {छत्रपति} की उपाधि भी दी थी।


{आधुनिक इतिहास}
गोरखों ने 1803 से 1815 तक बुशहर रियासत पर आक्रमण कर सराहन पर कब्ज़ा के कर लिया।

• उस समय रियासत का शासक राजा महेंद्र सिंह था।
• वजीर टिक्का राम और बदरी प्रसाद ने गोरखों के विरूद्ध युद्ध का नेतृत्व किया।

सतलुज नदी पर बने वांगतू पुल को तोड़कर गोरखों को रोका गया।

• 1857 ई में बुशहर रियासत के राजा शमशेर सिंह ने अंग्रेज़ो कि सहायता नहीं की।

• 13 नवम्बर 1914 को बुशहर रियासत का अंतिम शासक राजा पद्मसिंह गद्दी का बैठा तथा उसने 1947 तक शासन किया।

{सन् 1948 में बुशहर राज्य केंद्र शासित चीफ कमीश्नर क्षेत्र हिमाचल प्रदेश का हिस्सा बना। 1960 तक वर्तमान किन्नौर जिला, महासू जिला की मिनी तहसील बना। 21 अपै्रल, 1960 को किन्नौर हिमाचल प्रदेश का छठा जिला बना।

{संस्कृति , त्योहार , रीति – रिवाज}

Kinnauri bride

{विवाह}

जनेटांग जो कि एक व्यवस्थित विवाह है।

दमचल शीश , दमत्तंग शीश , जुजिश जो एक प्रेम विवाह है।

दरोश , डब डब , हाचिश जबरन विवाह के प्रकार है।

{त्योहार}
✓ छतरैल- जो कि चैत्र माह में मनाया जाता है।

✓ दखेरनी- जो कि सावन के महीने में मनाया जाता है।

✓ उखयांग या फुलेच – जो कि फूलों का त्योहार है और अगस्त में मनाया जाता है।

✓ तोशिम- यह अविवाहित पुरुषों द्वारा तथा इसमें [घांती] शराब का सेवन किया जाता है।


{पोशाक}
छमु कुर्ती पुरषों द्वारा पहनी जाने वाली कमीज़ है। छमू सुथन ऊनी पजामा है
महिलाएं डोरी , चोली और गचांग पहनती है
थेपांग हिमाचली टोपी का नाम है


{किन्नौर से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण पहलू}

लवी मेला बुशहर के राजा केहरि सिंह ने 1683 ई में शुरू किया था।

✓ किन्नौर के कड़चम में भेड़ प्रजनन केंद्र है।

कल्पा रिकांगपिओ से पहले किन्नौर का मुख्यालय था।

✓ छितकुल बस्पा घाटी का अंतिम गांव है।

चीनी कल्पा का पुराना नाम है।

✓ लद्दाख को किन्नौर में मोने नाम से पुकारते है।

✓ अंगुरो की भूमि रिब्बा हिमाचल किन्नौर में स्थित है।

{ जल विद्युत परियोजना}

• संजय जल विद्युत परियोजना (भाभा) – 120 mw

• नाथपा झाकड़ी – 1500mw

इरोम चानू शर्मिला आयरन लेडी ऑफ इंडिया


“सबसे लम्बी भूक हड़ताल” करनेवाली “इरोम शर्मीला”
जन्म-14 मार्च 1972
कोंगपालइम्फालमणिपुरभारत

राष्ट्रीयता-भारतीय

व्यवसाय-मानवाधिकार कार्यकर्ता, कवयित्री

प्रसिद्धि कारण-सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम,

१९५८ को हटाने के लिए भूख हड़ताल

माता-पिता
इरोम नंदा (पिता)
इरोम ओंग्बी सखी (माता)

  इरोम ने अपनी भूख हड़ताल तब की थी जब 2 नवम्बर के दिन मणिपुर की राजधानी इंफाल के मालोम में असम राइफल्स के जवानों के हाथों 10 बेगुनाह लोग मारे गए थे। उन्होंने 4 नवम्बर 2000 को अपना अनशन शुरू किया था, इस उम्मीद के साथ कि 1958 से अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, असम, नगालैंड, मिजोरम और त्रिपुरा में और 1990 से जम्मू-कश्मीर में लागू आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (एएफएसपीए) को हटवाने में वह महात्मा गांधी के नक्शेकदम पर चल कर कामयाब होंगी।


पूर्वोत्तर राज्यों के विभिन्न हिस्सों में लागू इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को किसी को भी देखते ही गोली मारने या बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार है। शर्मिला इसके खिलाफ इम्फाल के जस्ट पीस फाउंडेशन नामक गैर सरकारी संगठन से जुड़कर भूख हड़ताल करती रहीं। सरकार ने शर्मिला को आत्महत्या के प्रयास में गिरफ्तार कर लिया था। क्योंकि यह गिरफ्तारी एक साल से अधिक नहीं हो सकती अतः हर साल उन्हें रिहा करते ही दोबारा गिरफ्तार कर लिया जाता था।

 नाक से लगी एक नली के जरिए उन्हें खाना दिया जाता था तथा इस के लिए पोरोपट के सरकारी अस्पताल के एक कमरे को अस्थायी जेल बना दिया गया था।

उपवास का अंत:

26 जुलाई 2016 को इरोम शर्मीला ने घोषणा की के 9 अगस्त 2016 को वह अपना उपवास छोड़ेंगी। साथ ही उन्होंने मणिपुर राज्य चुनाव में खड़ा रहने की घोषणा भी की थी। अंततः 2000 से चले आ रहे उपवास का अंत 2016 में हुआ था।

{इरोम चानू द्वारा प्राप्त महत्वपूर्ण उपलब्धियां}
मानव अधिकार की सुरक्षा करने के उपलक्ष में 2007 में उन्हें ग्वांगजू प्राइज से सम्मानित किया गया।

✓ 2009 में उन्हें मयीलाम्मा संस्था का पहला मयीलाम्मा अवार्ड दिया गया, यह अवार्ड उन्हें मणिपुर में उनके द्वारा किये गए अहिंसावादी आंदोलन के लिए दिया गया था।

✓ 2010 में उन्हें एशियन ह्यूमन राइट्स कमीशन का लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड देकर सम्मानित किया गया। 

✓ उसी साल बाद में उन्होंने भारतीय योजना और निति आयोग का रबिन्द्रनाथ टैगोर शांति पुरस्कार भी जीता।

✓ 2013 में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी उन्हें राजनैतिक कैदी घोषित किया। 

✓ 2014 में इंटरनेशनल विमेंस डे पर MSN पोल में उन्हें टॉप वीमेन आइकॉन ऑफ़ इंडिया का शीर्षक दिया गया था।


इनके जीवन से हमें एक प्रेरणा दायक सीख मिलिती है कि हमें जीवन में कभी हार नहीं माननी चाइये। क्यों कि संघर्ष मनुष्य जीवन का हिस्सा है जिसे हमें मजबूरी नहीं बनाना चाईए ।


धैर्य, दृढ़ता, और पसीना सफलता के लिए एक अपराजेय मिश्रण हैं.

बर्फ के बीच कुदरती सौंदर्य का खज़ाना है हिमाचल प्रदेश का लाहुल-स्पीति

Kee Monastery

लाहौल और स्पीति अपनी ऊंची पर्वतमाला के कारण शेष दुनिया से कटा हुआ है। रोहतांग दर्रा 3,978 मी की ऊंचाई पर लाहौल और स्पीति को कुल्लू घाटी से पृथक् करता है। जिले़ की पूर्वी सीमा तिब्बत से मिलती है, उत्तर में लद्दाख भू-भाग (जम्मू और कश्मीर में स्थित) और किन्नौर एवं कुल्लूदक्षिण सीमा में हैं

लाहौल और स्पीति भारतीय राज्य हिमाचल प्रदेश का एक जिला है। जिले का मुख्यालय केलांग है। हिमाचल प्रदेश के दो पूर्व जिलों लाहौल और स्पीति के विलयोपरांत, अब लाहौल और स्पीति एक जिला है। विलय के पूर्व लाहौल का मुख्यालय करदंग और स्पीति का मुख्यालय दनकर था।

जनसंख्या
• घनत्व
33,224
• 2/किमी2 (5/मील2)
साक्षरता
73.10%%
क्षेत्रफल
13,833 km² (5,341 sq mi)
{महत्वपूर्ण दरे}
• कुंजुम – यह लाहुल को स्पीति से जोड़ता है।
• रोहतांग – रोहतांग दर्रा लाहुल को कुल्लू से जोड़ता है।
• कुगति- यह लाहुल को भरमौर से जोड़ता है ।
• बारालचा- लाहुल को लद्दाख से जोड़ता है।

{महत्वपूर्ण नदियां}
✓चंद्रा

✓भागा

✓ स्पीति

✓ पिन

• चंद्रा नदी शीगड़ी ग्लेशियर से होते हुए तांदी तक बहती है।
• भागा नदी बारालाचा दरे से निकलकर सुरजताल {सूर्य कि झील} में प्रवेश करती है।
• स्पीति नदी स्पीति की ओर किनौर की प्रसिद्ध नदी है। त्तथा खाब्ब के पास सतलुज में मिलती है।
• पिन स्पीति की सहायक नदी है।

{लाहुल से समधित महत्वपूर्ण पहलू}

✓ लाहुल को गारजा ओर स्वांगला भी कहा जाता है।
राहुल साकृत्यायन ने इसे देवताओं की भूमि कहा है।
✓ स्पीति का अर्थ है {मणियो की भूमि}
{लाहुल स्पीति इतिहास से समधित कुछ महत्वपूर्ण पहलू}

• मनु को इस क्षेत्र का प्राचीन शासक बताया जाता है।

• जासकर क्षेत्र में कनिष्क का एक स्तूप प्राप्त हुआ है।

• हवेन्नसांग ने 635 ई में कुल्लू और लाहौल की यात्रा की थी।

• हवेंसाग के अनुसार स्पीति पर सेन राजाओं का राज था।

•जिसका पहला राजा समुद्र सेन था।

• स्पीति के शासकों को नोनो कहा जाता
था।
{मध्यकालीन इतिहास}
✓ 8वी सदी में लाहौल कश्मीर का भाग बन गया था। कश्मीर कला 11वी सदी तक लाहौल में रहा।
✓ कुल्लू के राजा बहादुर शाह (1532-1559 ई) के समय लाहौल कुल्लू का भाग बन गया था।
✓ चंबा के राजाओं ने भी लाहौल अधिकार किया था उदयपुर का मृकुला देवी मंदिर चंबा के राजा प्रताप सिंह वर्मन ने बनवाया था।
✓ वर्ष 1681 ई में मंगोलों ने लाहौल पर आक्रमण किया था।
✓ कुल्लू के राजा मानसिंह (1690-1720 ई) ने गोंधला किला बनवाया।
{आधुनिक इतिहास}
✓ विलियम मुरक्राफ्ट की 1820 ई में लाहौल यात्रा का विवरण यहां दर्ज है।
✓ 1840 ई में लाहौल सिखों के कब्जे में आ गया।


सिखों के सेनापति जोरावर सिंह ने 1834-35 ई में लद्दाख , जास्कर और स्पीति पर आक्रमण किया।

• चंबा लाहौल और ब्रिटिश लाहौल का विलय 1975 ई में हुआ।

• अंग्रेजो ने बलिराम को लाहौल का पहला नेगी बनाया।

• 1857 ई के विरोध के समय स्पीति की नोनों बजिर ने अंग्रेजो की मदद की थी।

•1941 ई को लाहौल – स्पीति उपतहसील बनी और उसका मुख्यालय केलांग बनाया गया।


{कला , संस्कृति , मेले और गोंपा}

गोंपा:
खरदोंग गोंपा , शंशुर , गेमुर और गुरु घंटाल लाहौल में स्थित है।
ताबो , की ओर धांकर गोमा स्पीति में स्थित है।

{गेफांग , डाबला , और तंग्युर यहां के प्रमुख देवता है}

{त्योहार / उत्सव}
• लदार्चा
• सिस्सू मेला
• फागली मेला
• पौरी मेला
• हालदा / लोसर – यह नववर्ष का आगमन त्योहार है
{लोकनृत्य}

• शेहनी

• धुरे

• घारफी ( लाहौल का सबसे पुराना नृत्य)



:लाहौल स्पीति से समंधीत कुछ महत्वपूर्ण पहलू:
✓ विद्युत प्राप्त करने वाला विश्व का उच्चतम गांव किबर लाहौल स्पीति में स्थित है।

खोसकर चंद्रा घाटी पुराना गांव ( लाहौल का सबसे ठंडा गांव )

✓ केलांग की समुद्रतल से ऊंचाई 3165 मी है।

लोसर स्पीति का अंतिम गांव है।

✓ त्रिलोकीनाथ में अवलोकितेश्वर बोधिसत्व की संगमरमर की अष्टभुजी मूर्ति है।

धांकर स्पीति के राजा की राजधानी थी।

त्रिलोकीनाथ , उदयपुर , चंद्रा ताल लाहौल स्पीति के स्थित है।

कांगड़ा रियासत

त्रिगर्त के नाम से प्रसिद्ध काँगड़ा हिमाचल प्रदेश की प्राचीनतम रियासत है। महाभारत काल में इसकी स्थापना राजा सुशर्मा ने की थी। काँगड़ा को ‘त्रिगर्त’ के अलावा ‘नगरकोट’ के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीनकाल में यह कटोच राजाओं का केन्द्र रहा। ग्यारवीं शताब्दी में हिन्दू शाही वंश के शासक जयपाल की पूर्वी सीमा काँगड़ा था। सन् 1399 में तैमूर ने काँगड़ा पर आक्रमण किया था। जहाँगीर के समय 1620 ई॰ में काँगड़ा को मुगल साम्राज्य में जिला मिला लिया गया। उसके पश्चात काँगड़ा की स्थानीय राजपूत शैली और मुगल शैली से मिश्रित चित्रकारी की शैली विकसित हुई। 1785 ई॰ के पश्चात् संसारचंद व रणजीत सिंह का भी काँगड़ा पर अधिकार रहा। सन् 1966 के पंजाब पुनर्गठन के फलस्वरूप काँगड़ा को हिमाचल प्रदेश को सौंप दिया गया। 1 सितम्बर, 1972 को काँगड़ा जिला के तीन भाग कर ऊना, हमीरपुर, काँगड़ा जिलों का निर्माण किया गया।जिले के रूप में इसका गठन 1 नोवंबर 1966 को किया गया।

जनसंख्या– 11,74,072 (2001)
15,10,075 (2011)
क्षेत्रफल– 5,739 वर्ग कि.मी
पर्वत श्रृंखला- धौलाधार पर्वत श्रृंखला कुल्लू से होते हुए भंगाल क्षेत्र को पार कर कांगड़ा जिले में प्रवेश करती है। यह चंबा के हाथी धार के समांतर चलती है ।

कांगड़ा के इतिहास को पड़ने के लिए हमें कांगड़ा, गूलेर, नूरपुर, सीबा, दतारपुर, भंगाल , रियासतों का अध्ययन करना जरूरी है।
कांगड़ा रियासत के कुछ महत्वपूर्ण पहलू

कांगड़ा रियासत का प्राचीन नाम त्रिगत है ।


इस रियासत की स्थापना भूमिचंद ने कि थी । तथा राजधानी मुल्तान पाकिस्तान थी । बाद में इसकी राजधानी नगरकोट {वर्तमान कांगड़ा} बनी।

मुहमम्द गजनवी के दरबारी कवि उत्बी ने इसे { भिमकोट , फरिश्ता ने भीमकोट} तथा
अलबरूनी ने इसे नगरकोट की संज्ञा दी।

त्रिगत का अर्थ- तीन नदियों रावी, ब्यास , सतलुज के बीच फैले भू-भाग से है।

त्रीगत नाम { महाभारत , पुराणों , राजत्रंग्नी } में मिलता है।

और पाणिनि की अश्ठाध्याई में इसे {आयुधजिवी संघ} कहा गया है।

यात्री- 1615 ई में थॉमस कोर्याट्ट
1666 ई में थेवेनोट
1783 ई में फोस्टर
1832 ई विलियम मुरक्राफ्ट

मध्यकालीन इतिहास
महमूद गजनवी: 1009 ई में आक्रमण किया उस समय कांगड़ा का राजा जगदीश चंद था ।

• कांगड़ा किला 1043 ई में तुर्को के कब्जे में रहा।
• 1060 ई में कांगड़ा राजाओं ने पुनः किले प्र कब्ज़ा कर लिया।
• 1170 ई में पदमचंद और पुरावचंद {जसवान राज्य का संस्थापक} ने कांगड़ा प्र राज किया।
तुगलक:
• मुहम्मद बिन तुगलक ने कांगड़ा पर 1337 ई में आक्रमण किया उस समय कांगड़ा का राजा पृथ्वी चंद था।

फिरोजशाह तुगलक ने 1365 ई में आक्रमण किया उस समय वहां का राजा रुपचंद था।
• फिरोजशाह तुगलक ने ही ज्वालामुखी मंदिर से 1300 पुस्तकों का अनुवाद इज्जुदिं खालिद्दखानी द्वारा फारसी में करवाया ।

तेमुर लंग 1398 ई में आक्रमण किया उस समय कांगड़ा का राजा मेघचंद था।
संसार चंद प्रथम {कर्म चंद}का बेटा था। जो 1430 ई में राजा बना।
धर्मचंद , मानिक चंद , जयचंद और विधिचंद अकबर के समकालीन राजा थे।

नवाब अली खान कांगड़ा किले का पहला मुगल किलेदार था।
• आलामचंद ने 1697 ई में सुजानपुर के पास आलमपुर सहर की नीव रखी।

हमिरचंद आलमचंद का पुत्र जिसने हमीरपुर में किला बनाकर हमीरपुर शहर की स्थापना की।

इसके के ही शासनकाल 1740 ई में ही {सैफाली खान} कांगड़ा का अंतिम मुगल किलेदार बना।

कांगड़ा का आधुनिक इतिहास

• अभ्यचंद ने 1748 ई में ठाकुरद्वारा और टिहरा में एक किले कि स्थापना कि।

• घमंदचंड ने 1761 ई में सुजानपुर टिहरा की नीव रखी।

जस्सा सिंग रामगढिय़ा कांगड़ा पर आक्रमण करने वाला पहला सीख था। {संसारचंद द्वितीय के समय पर}

• संसार्चंद ने रिहलू के लिए चंबा के राजा को नरेटी शाहपुर में हराया और मंडी राजा ईश्वरीय सेन को 13 वर्षों तक बंदी बना रखा।

• कहलूर (बिलासपुर) के राजा महांचंद ने ( गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ) को संसार चंद पार आक्रमण के लिए निमंत्रण दिया ।

अमर सिंह थापा ने 1805 ई में संसार चंद को महालमोरिया (हमीरपुर) में हराया।

• संसार चंद ने नोरांग बजीर की मदद से 1809 ई में (महाराजा रणजीत सिंह) के साथ ज्वालामुखी की संधि की।

• महाराजा रणजीत सिंह ने 1809 ई में अमर सिंह थापा को हराया ।

मान सिंह को उसकी बहादुरी के लिए {शेर ए अफ़ग़ान} की उपाधि दी।

• नूरपुर का प्राचीन नाम धमेरी था। इसकी स्थपना दिल्ली के तोमर राजपूत झेठ पाल द्वारा 1000 ई में हुई ।

• कैलाश पाल ने तांतार खान को हराया।

सिब्बा राज्य– सीबा गलेर राज्य की शाखा थी। जिसकी स्थापना गुलैर के राजा छोटे भाई सीबा राम ने 1450 ई में की थी।

दतारपुर राज्य– जस्वान के दक्षिण , सीबा पश्चिम , गूलैर के उतार के स्थित था। दतारपुर सीबा राज्य की शाखा थी ।
जिसकी स्थापना 1550 ई में दतारचंद ने की थी।

भगाहाल राज्य– इस राज्य की स्थापना एक ब्रह्मण ने की को राजा बनने। के बाद चंद्रवंशी राजपूत कहलाया। पृथ्वी पाल प्रसिद्ध राजा रहा था जिसे मंडी के राजा सिधसेन ने दमदमा महल में मरवाया।

{ कांगड़ा से संबधित कुछ महत्वपूर्ण पहलू}

• कांगड़ा जिले में 1849 ई में चाय की खेती शुरू हुई।
• बिर में चाय प्रोसेसिंग खोला गया।
• नगरोटा में 1936 ई में मधुमक्खी पालन फार्म स्थापित किया गया।

{ धार्मिक स्थान }

• ज्वालामुखी मंदिर

• बृजेश्वरी मंदिर

• बैजनाथ मंदिर

• नूरपुर में गंगा मंदिर

कांगड़ा से संबधित कुछ और महत्वपूर्ण पहलू

• हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड धर्मशाला में स्थित है।

• यहां बोध धर्म दलाई लामा का निवास स्थान है । तथा धर्मशाला को छोटा तीबत या मिनी लहसा के नाम से जानते है ।

• धर्मशाला में वार मेमोरियल (युद्ध स्मारक) है।

• धर्मशाला में 1863 ई में लॉर्ड एल्गिन को दफनाया गया था।

आयुर्वेदिक कॉलेज पपरोला में जिसकी स्थापना 1978 ई में को गई थी।

• पालमपुर में कृषि विश्वविद्यालय है जिसकी स्थापना भी 1978 ई में गई है।

• कांगड़ा अंद्रेटा में शोभा सिंह अर्ट गैलरी है ।

ऐम . एस रंधावा ने कांगड़ा पेंटिंग और जे. सी फ्रेंच ने संसार चंद of कांगड़ा किताब लिखी।

{जलविद्युत परियोजनाएं}
• पोंगजल ब्यास नदी -396mw


• गज परियोजना शाहपुर- 10mw


• बनेर जल विद्युत परियोजना- 12mw

चम्बा रियासत


चम्बा रियासत के चम्बा जम्मू और कश्मीर से उतर-पश्चिम, जम्मू-कश्मीर राज्य के लद्दाख क्षेत्र और हिमाचल प्रदेश के लाहौल और बडा-बंगाल क्षेत्र, दक्षिण-पूर्व और दक्षिण में जिला कांगडा द्वारा उतर-पूर्व और पूर्व में चम्बा की सीमा पर पंजाब के हिमाचल प्रदेश और गुरदासपुर जिला स्थित है।चम्बा जिला उतर अक्षांश 32̊ 11’ 30“ और 33̊ 13’ 6“ और पूर्वी देशांतर 75̊ 49’ और 77̊ 3’ 30“ के बीच स्थित है अनुमानित क्षेत्र के 6522 वर्ग कि0 मी0 के साथ और विशाल पहाडी पर्वतमाला द्वारा सभी तरफ से घिरा हुआ है। यह क्षेत्र पूर्ण रुप से 2000 से 21000 फीट तक की ऊंचाई वाली पहाडी हैं।
चम्बा भगवान शिव की भूमि अपने अनछुए प्राकृतिक सौदंर्य के लिए प्रसिद्ध हैं। मख्य पर्यटन स्थलों के रुप में जिले में डलहौजी, खज्जीयार, चम्बा शहर, पांगी और भरमौर है। यहां पांच झीलें है, पांच वन्य जीव अभ्यारण और अनगिनत मन्दिर हैं।
चम्बा, हिमाचल प्रदेश का एक छोटा लेकिन आकर्षक पर्यटन स्थल है, इसकी उतम प्राकृतिक सुन्दरता के लिये जाना जाता है। यह जगह, सुरम्य और सफेद घाटियों के बीच स्थित है, पर्यटकों द्वारा वर्ष भर मे दौरा किया जाता हैं। पहाडो की उप-हिमालय श्रृंखला, विविध, वनस्पतियों और जीवों से भरा है। चम्बा को एक प्राणपोषक अनुभव बनाते है। जगह का सुखद माहौल एक और पहलू है कि चम्बा पूरे भारत में लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक हैं। जिले रूप में इसका गठन 15 अप्रैल 1948 को हुआ था।

चम्बा रियासत के महत्वपूर्ण पहलू


चम्बा रियासत की स्थापना 550 ई में अयोध्या से आये सूर्यवंशी राजा मारू ने की थी।


आदित्या वर्मन ने सर्वप्रथम वर्मन की उपाधि धारण की थी।


मेरु वर्मन ने भरमौर में मणिमहेश, लक्षणा देवी मंदिर, गणेश मंदिर, नर्सिंग मंदिर और चतरारी में शकतीदेवी मंदिर निर्माण करवाया।


गुगा शिल्पी मेरुवर्मन का प्रसिद्ध शिल्पी था।


लक्ष्मी वर्मन के कार्यकाल में तिब्तियो (किरातो) ने चम्बा में कब्ज़ा किया।

सहिलवर्मन ने चम्बा शहर की स्थापना की। उसने अपनी पुत्री चंपावती के नाम पर चम्बा नाम रखा।


साहिल वर्मन को चरपट सिद्ध योगी ने दस पुत्र और एक पुत्री का आशीर्वाद दिया था।


सहिलवर्मन की पत्नी रानी नैना देवी ने शहर में पानी की व्यवस्था लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया ।
रानी नैना देवी की याद में हर वर्ष सुही मेला मनाया जाता है।साहिल वर्मन ने लक्ष्मी नारायण, कमेशावर मंदिर का निर्माण करवाया।


युगांकर वर्मन की पत्नी त्रिभुवन रेखा ने भरमौर में नरसिंह मंदिर का निर्माण करवाया।


जसाटा वर्मन क समय का शिलालेख चुराह के लोहटिक्री में मिला है।


ललित वर्मन के कार्यकाल में दो पत्थर लेख डिबी कोठी और सेचुनला (पांगी) में प्राप्त हुए।


गणेश वर्मन ने राज परिवार में सर्वप्रथम सिंह की उपाधि का प्रयोग किया।


उमेद सिंह ने राजनगर में नाडा महल बनवाया ।


राजा भुरिसिंह को 1 जनवरी 1906 ई को नाइट हुड की उपाधि प्रदान की गई।


भुरी सिंह संग्रहालय को स्थापना 1908 ई में की।


राजा लक्ष्मन सिंह चम्बा का अंतिम राजा था।


चकली चंबा रियासत का प्रसिद्ध सिक्का था।


लकड़ शाह ब्रह्मण श्री सिंह के समय में प्रसिद्ध हुआ।


जतिगीरी पर्यटक स्थल चंबा में स्थित है।


गुड़ मास की बुनाई चंबा में होती है।


1839 ई में यूरोपीय यात्री विंग्ने पहली बार चंबा आया था।


चंबा में बशोली चित्रकला शैली विकसित हुई।


अजित सिंह मेमोरियल चंबा के पंजपुला (डलहौजी) में स्थित है।


तुनुहटी चंबा में स्थित है।


मेले, मंदिर ,कला, एंव संस्कृति

मिंजर मेला- मिंजर मेला साहिल वर्मन द्वारा शुरू किया गया था। इसमें चंबा के लक्ष्मीनारायण मंदिर में पूजा की जाती है।
मिंजर का अर्थ – मक्की का सीटा जिसे रावी नदी में बहाया जाता है।

दूसरा इस मेले को राजा प्रताप द्वारा कांगड़ा शाशक पर विजय का प्रतीक भी माना जाता है।


सुही मेला- यह मेला साहिल वर्मन ने शुरू किया था। साहिल वर्मन की पत्नी नयना देवी की राज्य में पानी की आपूर्ति के बलिदान देने पर यह मेला प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

यात्रा- फूल यात्रा

मणिमहेश यात्रा

नवाला मेला चंबा में गद्दी जनजाति द्वारा मनाया जाता है
कला– चंबा की रुमाल कला ।

चंबा शेली की चित्रकला का उदय राजा उदय सिंह समय में हुआ गुलेर से आए निक्कू, छजू , हरकु इस शैली के मुख्य कलाकर थे।
लोकनृत्य– झांजर, नाटी

गीत – कुंजू चंचलो, रंजू- फुलमू, भूकू-गदी

भाषा – चंबयाली , भट्यती , चुराह, पंगवाली, भरमौरी



जल विद्युत परियोजना- चमेरा-1 (540mw)

चमेरा-2 (300mw)

बेरास्युल- 198mw

हडसर-60mw

Lakes of North India

डल झील 
श्रीनगरकश्मीर में एक प्रसिद्ध झील है। १८ किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई यह झील तीन दिशाओं से पहाड़ियों से घिरी हुई है। जम्मू-कश्मीर की दूसरी सबसे बड़ी झील है। इसमें सोतों से तो जल आता है साथ ही कश्मीर घाटी की अनेक झीलें आकर इसमें जुड़ती हैं। इसके चार प्रमुख जलाशय हैं गगरीबल, लोकुट डल, बोड डल तथा नागिन। लोकुट डल के मध्य में रूपलंक द्वीप स्थित है तथा बोड डल जलधारा के मध्य में सोनालंक द्वीप स्थित है। भारत की सबसे सुंदर झीलों में इसका नाम लिया जाता है। पास ही स्थित मुगल वाटिका से डल झील का सौंदर्य अप्रतिम नज़र आता है। पर्यटक जम्मू-कश्मीर आएँ और डल झील देखने न जाएँ ऐसा हो ही नहीं सकता।
डल झील के मुख्य आकर्षण का केन्द्र है यहाँ के शिकारे या हाउसबोट। सैलानी इन हाउसबोटों में रहकर झील का आनंद उठा सकते हैं। नेहरू पार्क, कानुटुर खाना, चारचीनारी आदि द्वीपों तथा हज़रत बल की सैर भी इन शिकारों में की जा सकती है। इसके अतिरिक्त दुकानें भी शिकारों पर ही लगी होती हैं और शिकारे पर सवार होकर विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ भी खरीदी जा सकती हैं। तरह तरह की वनस्पति झील की सुंदरता को और निखार देती है। कमल के फूल, पानी में बहती कुमुदनी, झील की सुंदरता में चार चाँद लगा देती है। सैलानियों के लिए विभिन्न प्रकार के मनोरंजन के साधन जैसे कायाकिंग (एक प्रकार का नौका विहार), केनोइंग (डोंगी), पानी पर सर्फिंग करना तथा ऐंगलिंग (मछली पकड़ना) यहाँ पर उपलब्ध कराए गए हैं। डल झील में पर्यटन के अतिरिक्त मुख्य रूप से मछली पकड़ने का काम होता है।
क्या आप इस झील के बारे में अधिक जानने में रुचि रखते हैं? यहाँ कुछ त्वरित तथ्य दिए गए हैं जिससे आप चुपके से झांक सकते हैं:🤩
1. डल झील सिर्फ एक झील नहीं है, बल्कि यह तीन झीलों का मिलन है। इसे दो और भागों में बांटा गया है, लोकुट और बोड दल। यह जम्मू और कश्मीर की दूसरी सबसे बड़ी झील है और पर्वतीय झील मर सर से इसकी जलापूर्ति होती है।जब आप डल झील पर जाते हैं, तो आप इसे जटिल जलमार्ग, कई चैनलों, और तैरते हुए द्वीपों से मिलकर एक करामाती भूलभुलैया पाएंगे। डल झील मछली पकड़ने की गतिविधियों के लिए भी लोकप्रिय है और इसका उपयोग पानी के पौधों की कटाई के लिए भी किया जाता है।
2. झील की रेखा सुंदर फूलों के बागानों, होटलों और पार्कों से घिरी हुई है। इसके चारों ओर के उद्यान स्वतंत्रता-पूर्व युग में बनाए गए थे। उनमें से सबसे प्रसिद्ध शालीमार बाग है।आप शालीमार बाग से डल झील के शानदार दृश्य का आनंद ले सकते हैं। सर्दियों के दौरान, जब तापमान -11 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है, तो झील जम जाती है। आप डल झील की जमी हुई सतह पर स्कीइंग का आनंद ले सकते हैं। 
3. यह झील 18 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है और लगभग 21.1 वर्ग किलोमीटर के वेटलैंड के क्षेत्र को भी कवर करती है। इस वेटलैंड में सभी तैरते हुए बगीचे और पानी के बागान शामिल हैं। यदि आप जुलाई के महीने में डल झील की यात्रा करते हैं, तो आपको ये तैरते हुए बागान अलग-अलग रंग के फूलों से ढके हुए मिलेंगे। पूरे झील में वनस्पति की प्रचुरता है। आपको पाइन, क्यूप्रेसस, जेरार्डियाना, सेल्टिस जैसे पेड़ कुछ ही नाम मिलेंगे।
4. प्राचीन शास्त्रों में, डल झील को महासरित माना जाता है।शास्त्रों के अनुसार, झील के पूर्वी हिस्से में इसाबार नाम का एक गाँव था और देवी दुर्गा का निवास था।
5. मुगलों ने कश्मीर राज्य को डिजाइन करने में बहुत सावधानी बरती। चूँकि श्रीनगर अपनी सुंदर सुंदरता के कारण लोगों द्वारा बार-बार देखा जाता था, इसलिए मुगलों ने झीलों और आस-पास के बगीचों को डिजाइन किया ताकि जगह को और अधिक सुंदर बनाया जा सके। डल झील उनमें से एक थी।

Rewalsar Lake

Rewalsar lake
Rewalsar is an important religious places for Hindus, Sikhs and Buddhists alike. The natural lake at Rewalsar is famous for its floating reed islands and fishes. Hindu, Buddhist and Sikh shrines exist along the periphery of Lake. Legend has it that the great teacher and scholar Padmasambhava used his enormous powers to take flight to Tibet from Rewalsar. It is believed that tiny islands of floating reed in Rewalser Lake have the spirit of Padamasabhava embodied in it. An imposing statue of Padamsambhava is also built in Rewalsar. At this place Sage Lomas is believed to have performed his penance to appease Lord Shiva. The Gurudwara Shri Rewalsar Sahib is associated with the tenth Guru, Guru Gobind Singh ji who called upon Pahari Rajas to be united in his fight against Mughals. People of all religion come to Rewalsar for a Holy bath on Baisakhi. There are three Buddhist monasteries at Rewalsar. It has a Gurudwara that was built in 1930 by Raja Joginder Sen of Mandi. There are Hindu temples which are dedicated to Lord Krishna, Lord Shiva and sage Lomas alongside the lake. Naina Devi Ji Temple: Situated at a distance of 10 Km from Rewalsar, a temple of Naina Mata exist on a hill top. It is believed that eye of Sati fell on the place and a temple of Naina Devi was built on this sacred place. Devotees from all corners of the State visit the temple throughout the year. The place is surrounded by pine trees and presents a panoramic view of Balh & Sarkaghat Valleys. People also love to trek to this place from Rewalsar. On way to Naina Devi temple we come across another lake known as Kunt Bhayo named after Kunti, the mother of Pandavas. It is said that Arjun created the lake to quench the thrist of his mother. There exist six other lakes of legend locally known as “Sar” in this area. Most of the water in these lakes is collected during the rainy season.

Queen of Lakes

Prashar Lake
The lake is located at a height of 2730 m above sea level. With deep blue waters, the lake is held sacred to the sage Prashar and he is regarded to have meditated there. Surrounded by snow-capped peaks and looking down on the fast flowing river Beas, the lake can be approached via Drang. Prashar lake is protected by a fence so nobody can enter it. There is a round, floating island inside the lake. The floating land moves in all directions in the lake. The floating land covers 29% of area of lake whereas water is with 71%. This is approximate percentage of water and land we have on the earth. The temple was built in the thirteenth century and legend has it was built by a baby from a single tree. The lake has a floating island in it and it is said to be unclear how deep it is, with a diver not being able to determine its depth.

Mysterious
Story of this lake

It is believed that Sage Prashar meditated on the banks of this lake, hence it is named as Prashar Lake. Bhima, one of the Pandava brothers, had created the lake. The story says, after the Kurukshetra / Mahabharat war, Pandavas were returning with Lord Kamrunag. When they reached this place, Kamrunag loves the tranquil surroundings and decides to live here forever. So, Bheem (the strongest of the lot) rams his elbow on one of the mountains and creates a big dent in the land. This dent became Prashar Lake.[2]
Till now no one has been able to find out the depth of Prashar Lake.